1857: क्या क्रांति में दलित राजनीति का साझा इतिहास नहीं है!

संघर्षों के साए में ही असली आज़ादी चलती है,
इतिहास उधर मुड जाता है जिस ओर जवानी चलती है|
श्रीमान लालजी निर्मल ने सवाल उठाया है कि लोगों को अपने गौरवशाली अतीत पर नाज है ,कतिपय लोगों को अपने वर्तमान पर फख्र है ।दलित किस पर नाज करें ! 
निर्मल जी को मेरा जवाब है कि इस देश के दलित वर्ग को अपने संघर्षों पर गर्व करना चाहिए| शोषण के खिलाफ लड़ी जा रही लड़ाई पर नाज करना चाहिए| सभी दलित जातियों ने देश की बागडोर हाथ में लेकर देश के लिए कुर्बानियां दी हैं| संकट के समय कौम और देश दोनों अपने बीच से लीडर पैदा करते है | जिन कौमों ने संघर्ष किया है, इस देश का वर्तमान उन्ही के संघर्षों से बना है|   चन्द्रगुप्त मौर्य से राजा मार्तण्ड वर्मा से लेकर सुहैल देव पासी की कहानियां आज भी अवाम के लिए प्रेरणा स्रोत हैं| वाल्मीकि और व्यास की रामायण और महाभारत आज भी लोकमानस की प्रमुख प्रेरणा है| अगर शोषक और शोषित के फर्क से समाज का वर्गीकरण करना है तो 1857 की नजीर सामने रखने की जरुरत हैं जब मातादीन भंगी ने सेकंड बंगाल कैवलरी में रहते हुए सैनिकों को भड़काया और क्रांति हुई| यह युद्ध दुनिया की सभ्यताओं के लिए सबसे बड़ी नजीर साबित हुआ| कानपुर ने अपनी जंग जीती और उसका हश्र ये हुआ कि एक एक करके पूरी दुनिया से अंग्रेज और गुलामी दोनों उखड गए| जाहिर है कि एक चिंगारी भी आग लगाने को काफी होती है| कानपुर आज़ादी की लड़ाई में सबसे पहले आजाद होने वाला शहर रहा है| भले ही उस आज़ादी की कीमत चुकानी पड़ी हो| भले ही अवाम को हफ़्तों अपने घरों में नजरबन्द रहना पड़ा हो, उस हार का बदला लेने में हुकूमत ने अवाम को क्या क्या दिन दिखाए कभी इसका जिक्र होगा तो सब तस्वीर साफ़ हो जाएगी| आर्थिक संकटों में जब गाँव के गाँव गुलाम हुए तो उसकी अवाम का बदहाल होना स्वाभाविक है| सामने मौजूद ऐसे मामलों में निदान समाधान के लिए बुनियादी प्रेरणा भी बनाने की जरुरत है|
कितने दिन यह कहके प्रेरित किया जाता रहेगा कि कानपुर की हार से बौखलाए अंग्रेज ने हिन्दू-मुसलमानों दोनों को सजा दी| कानपुर पर दोबारा कब्जे में उन्होंने हिन्दुओं को गाय का मांस खिलाकर और मुसलामानों को सूअर की चर्बी में लपेटने के बाद फांसी पर चढ़ाया| बूढ़ा बरगद तमाम फांसियों का साक्षी है| अब ये मत कहिये कि लड़ने वाली अवाम भी उच्च और निम्न वर्ग, दलित और महादलित वर्ग में बंट कर नहीं हारी| आज हमे उन सार्वजनिक जीवन की बुराइयों से भी लड़ने के लिए युद्धस्तर पर जुटने और जूझने की जरुरत है| कम से कम अपनी अपनी कौम की जिम्मेदारी उठाने वाले आगे आयें तो ईमानदारी से बात हो सके|


ये बुनियादी बातें इस देश की हर तबके की अवाम को समझनी होंगी| उसके बगैर बेलागलपेट बातें भी होनी मुश्किल हैं| इतिहास के पड़ाव हैं पटेल और अम्बेडकर उनके आगे और पीछे के हजार दो हजार सालों के लोकजीवन की सच्चाइयों को खोजने में लगे लोगों को भी वास्तविक इतिहासबोध के साथ बने बिगड़े भारत की तस्वीर से वाकिफ होने की जरुरत है| ऐसी कोई कौम नहीं जिसने इस देश की बेहतरी में कुछ न कुछ पाया खोया न हो, आज़ादी की लड़ाई में तो साहेब लोगों को छोड़कर बाकी सबने कुछ न कुछ खोया ही है| लेकिन ग्रामीण आबादी का संघर्ष ज्यादा गहरा हो गया है| यह इसलिए भी क्योंकि गाँव की अवाम अपने ही होशियार बच्चों को शहर भेजने पर मजबूर है| कितने लायक समझदार गाँव में रुकते हैं अवाम के लिए? अवाम की भलाई को जिंदगी का मिशन बना के एक बड़ी आबादी ने आज़ादी के लिए भले ही जान दे दी हो लेकिन अम्बेडकर के मिशन, कांशीराम के दलित आन्दोलन जैसे पूण्य कर्म आज दलित राजनीति के भूले-बिसरे गीत बन रहे हैं| नेता तो नेता उनकी मूल प्रेरणा बौद्ध धर्म तक का असली चेहरा देख सुन पाना मुश्किल है| सबको सूत्र में जोड़ने वाले इंसानी धर्म की ये बदहाली सारे देश में दीगर है| ऐसे में सच, साहस, ईमानदारी भर से बेहतरी का सपना देखने वालों की भी पूरी नस्ल बनाने की जरुरत है| वही असल की फसल कही जाएगी| नक्सली भी मिशनरी बनाते हैं और जिहादी भी लेकिन कांशीराम और अम्बेडकर साहेब का रास्ता ज्यादा कारगर साबित हुआ है| उस पर आगे बढ़ने की जरुरत है|

कार्पोरेटी और नौकरशाही तरीके से बने प्रतीकों में से एक है एनफील्ड जो1857 में बंदूकें बनाने का कारोबार करती थी| किसी समय में सैनिक साजो सामान में शुमार कंपनी का कारोबार गाय और सूअर की चर्बी लगे कारतूस बनाना हुआ करता था| कंपनी वर्तमान के कारोबार में आज गौरव का एक प्रतीक गढ़ती है| 1857 की बन्दूक वाली कंपनी का यह गौरवगान सेना और नौकरशाही की पसंदीदा मोटरसाइकिल है| बाज़ार में छवि का खेल भी दीगर है, दलित की छवि, बैंडिट, की छवि, मुल्ले की छवि पंडित की छवि सब पहन के बोली बानी होती है| लेकिन दिक्कत यहीं है कि बोली बानी से आगे बढे मामलों में हमारे नायक अकेले छुट जाते हैं, इतिहास की तरह भुला दिए जाते हैं| इसलिए संघर्षों की परम्पराएँ जारी रखने की जरुरत है|
कवि दुष्यंत के शब्दों में कहें तो,
हो गयी है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए, 
इस हिमालय से कोई गंगा निकालनी चाहिए,
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि बस सूरत बदलनी चाहिए,
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही 
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए|
क्रांति जिंदाबाद!

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