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क्या दलित चेतना में भी सुलग रहा है गाय का सवाल !

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यूँ तो ये तस्वीर ग्रामीण भारत की एक आम तस्वीर हैं लेकिन इस तस्वीर के साथ लालजी निर्मल लिखते हैं कि जालौन के मरगांव का यह दलित युवक एक मृत बछिया को डिस्पोज करने जा रहा है ।इसे ले जाने के एवज में इसे आधा किलो अनाज मिला है ।अपने मुल्क भारत मे एक और भारत बसता है दलित भारत| इसमें, डिस्पोज करना, पारिश्रमिक या सामुदायिक चित्ति में गड़बड़ी कहाँ है और ठीक क्या करना है उसका इलाज तो जैसा देश वैसा भेस की तर्ज पर हो सकेगा, लेकिन बीते दशकों और दो सौ सालों में जो तस्वीर सामने आ रही है उसमें बहुत कुछ और जोड़कर देखे जाने की जरुरत है, गाँव हो या देश चित्र की समग्रता और चित्ति की समग्रता दोनों के बगैर हल नहीं होने वाला| खांचे बना के शिक्षित-उपेक्षित का भेद करके जो तस्वीरें आज आ रही हैं,  ऐसा नहीं है कि ये तस्वीर लालजी निर्मल  निकले हैं तभी सामने आ रही हैं, इस तस्वीर की बयानी देख के बरबस ही दलित शोषण का एक फ़िल्मी चित्र  सामने आ जाता है, वर्ग विशेष के साथ विशेष संवेदना सामान्य बात है, दलित शोषित वंचित पीड़ित बता के अवाम की सहानुभूति तो हासिल हो ही जाती है| भले ही तस्वीर के पीछे बुंदेलखंड के आर्थिक पिछड़ेपन का …