......या चूक गए शहर के "पाठक" और "विद्यार्थी"?

देश को देश की सत्ता सरकार के साथ साथ कानून और संस्कृति का भी सम्मान करना चाहिए| आज की गाली गलौज की राजनीति देश की बदहाली की अहम् वजह है| इसके चलते युवा इस राजनीति में सिर्फ मौके की तलाश में लगा नजर आता है| आज युवा को देश और राष्ट्रवाद के लिए दीनदयाल के आदर्श नहीं बल्कि दीनदयाल ग्राम विकास योजनाओं के प्रोजेक्ट चाहिए| दीन दयाल ग्राम विद्युतीकरण योजना की ठेकेदारी चाहिए| उसको हासिल करने के लिए वह देना और लेना दोनों करने में गुरेज नहीं करता| उस पर भी तुर्रा यह है कि वही युवा भ्रष्टाचार के खिलाफ अवाम की आवाज भी बना बैठा है| लेकिन इतना तो तय है कि देश का ताना-बाना तो वह युवा ही बनाएगा| आज उस युवा के सामने दम तोडती नैतिकता का संकट है| आज युवा के सामने रोटी रोजगार का संकट है| पिछले तीस सालों की सरकारों ने युवाओं के लिए भारी जीवन संकट खड़ा किया है| आज सट्टेबाजी कानपुर के सबसे बड़े रोजगार में से है| आज गुटखे ने कैंसर के अस्पताल खड़े करवा दिए| जाहिर है कि हमारे अपने इरादे इतने बुलंद हो चुके हैं कि आजू-बाजु चाहे जो मरे कोई फर्क नहीं पड़ता| किसी के साथ कोई भावना बनाने के लिए विज्ञापन प्रचार ज्यादा अहम् होता जा रहा है| यह सामाजिक गिरावट है| यही गिरावट उस अहंकारी युवा के स्वभाव का हिस्सा बन रही है| आचरण में गिरावट का दौर स्कूलों से तय करना भी चाहें तो कोई न कोई प्राइवेट स्कूल ही जिन्दा नजर आता है| सरकारी स्कूल तो सिर्फ अध्यापक पालने के केंद्र बन गए, वीरान हो गए| अगर मिड डे मील पर स्कूल चल रहा है तो ऐसे में घरों में सब कुछ ठीक तो नहीं| किस आदमी को अच्छा लगेया कि उसका बच्चा थाली कटोरी लेकर स्कूल जाए| लेकिन ये हुआ, बिटिया स्कूल जा रही है और वहीं पे खाना मिलेगा| दिल पे हाथ रख के बताइए कि क्या आपने अपने बच्चे को किसी सरकारी स्कूल में भेजने के बारे में सोचा| किसी और को ये बदहाली हो क्या आप ये सोच सकते हैं? क्या आपको भूख का अंदाजा नहीं? क्या किसी भूखे बच्चे के परिवार के विषय में सोचा कि वे क्या खाते होंगे? बेचारों ने किन हालातों में अपने बच्चों को हाथ में कटोरा लेकर स्कूल भेजा होगा? क्या कहाँ ऐसे लोग आपको दिखाई नहीं देते? माफ़ कीजियेगा लेकिन क्या आपने निर्माण मजदूरों की जिंदगी के नजदीक से गुजरे तक नहीं| किसी प्राइवेट अस्पताल, दुकान, फैक्ट्री, स्कूल में किसी मजदूर से भी नहीं मिले? क्या आपने देखा कि उनके वेतन क्या हैं? कैसे चार-पांच हजार के वेतन में जिंदगी का गुजरा होता है कैसे उनके बच्चे पढ़ पाते हैं और कैसे वो दो हजार रूपया कमा के बच्चों को आला दर्जे की शिक्षा दिलवा सकते हैं| कैसे उनके बच्चे पढ़ें कैसे सब आगे बढ़ें क्या ये अहम् सवाल नहीं? क्या कटोरा लेकर स्कूल जाने वाले बच्चों को खाती पीती और खुशहाल जिंदगी जी पाने का हक नहीं? लेकिन जरा बताएं तो कि इतनी सिंपल सिंपल बातें करने की दम किस नेता में है? आज हमारे नेता विकास तो दे रहे हैं लेकिन मजदूरों की बदहाली से अनजान होते हुए फैसले कर रहे हैं| उन्ही मजदूर संगठनों के विरोध के बावजूद एफडीआई की जिद के ओईएफ और पराग में क्या मायने होंगे ये अपने शहर के ही बड़े मामले हैं| इतनी सिंपल सिंपल बातों में विदेशी बैसाखी पकड़ा देने का खेल है एफ.डी.आई.| आज स्कूल और डेरी सेक्टर में एफ.डी.आई. के नज़ारे सामने हैं? सहयोग और सेवा की भावना के बिना स्कूल चल सकते हैं क्या? पराग का बंद होना और नमस्ते इंडिया का खड़ा होना एक नजीर है, देश के सबसे बड़े दुग्ध उत्पादक गुजरात गुजरात कोऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन के प्रबंध निदेशक आर एस सोढ़ी का कहना है कि फ्री ट्रेड के नाम से हो रहे सौदों में देश का घरेलू डेरी उद्योग लुट जायेगा| इससे भारत के उभरते बाजार से सीधे जुड़े करोड़ों किसानों पर सीधा असर पड़ेगा| उनकी बात का एक बड़ा पहलू ये भी है कि भारत का डेरी उद्योग आत्म निर्भर होने के साथ साथ दस करोड़ लोगों को रोजगार भी देता है, जिसमे से अधिकांश महिलाएं हैं| यह सेक्टर लघु और सीमान्त किसानों, भूमिहीन गरीबों और लाखों परिवारों के लिए जीवन रेखा जैसा है| आज तक वे ही इस सेक्टर की रीढ़ रहे हैं| कितने अध्यापक और छात्र चट्टों की बदहाली और गाय की दुर्गति के गवाह हैं? कितने लोगों को पता है कि एफडीआई के दम पर चली कंपनी ने शहर के कूड़े का ए2जेड कर दिया| आप हम और सभी इसके गवाह हैं? क्या सहयोग और सेवा की भावना एफ.डी.आई. से आएगी? लेकिन दुर्भाग्य सच और साहस के साथ जमीनी हकीकत से दूर, चोंच पर चोंच लड़ा के समय गवां रहे युवा की सोच और शास्त्रों का कोई कनेक्शन भी है या ऐंवें ही चल रहा है| दीनदयाल दयाल उपाध्याय जनसंघ के संस्थापक थे| सर आशुतोष मुखर्जी के सुपुत्र श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ मिलकर भाजपा का बुनियादी ढांचा रखने वाले पंडित दीनदयाल उपाध्याय मुगलसराय में मरे| एक ट्रेन दुर्घटना में| उन्होंने ने देश की परिभाषा गढ़ी कि देश भावनात्मक एकता पर आधारित भौगोलिक इकाई है| सभी को उनके एकात्म मानववाद जैसी बुनियादी समझ से वाकिफ होने की जरुरत है| यही उनका दर्शन था जिससे देश में भाजपा की राजनीतिक बुनियाद बनी| आज वो बुनियादी कार्यकर्ता, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, भारतीय मजदूर संघ अन्दर से हताश है| वह डेवलपमेंट में आदमी और नदियों की बदहाली से हताश है, अपने ही नेताओं के खोखले दावों को भुगत रही अवाम से हताश है| हाथ फैलाये रही घूम रही अवाम के खिलाफ आम लोग तो यही सोच के गुस्सा होते हैं कि निचली अवाम उनके कर से पल रही है| उसी अवाम से मेहनत करवा के महल खड़े करने वाले मेहनतकाश को मकान देने में लाइन लगवा के मजे लेते हैं| ये हालत देख के संस्थानों और सरकार के लिए क्या सम्मान पैदा होता है? सरकारी संस्थान जमीन और पानी की पाकीजगी बरक़रार रखने में कारगर और कामयाब नहीं और अवाम खुद ही पूरे शहर को कूड़ा बनाने में लगी हुई है| बदहाली का ये नजारा स्कूलों के बगैर कैसे बदलेगा?स्कूलों में रोजगार व्यापर और घरों में संस्कार सिखाने के लिए पाठशालाओं के बगैर प्लान बनाने में लगे महापुरुषों को मेरा नमन| उन महापुरुषों को देश और अपने घर में फर्क दीखता है तो उनकी बुद्धि को भी प्रणाम| अगर देश के फैसले अपने घर की तरह नहीं करेंगे तो अवाम की दीगर बदहाली आपकी काबिलियत बयां कर देगी| इसीलिए जब नेहरु के बाद कौन का संकट हुआ तो देश को शास्त्रीजी की नजीर मिली| वे लोग जो अपने वतन और देश के सम्मान में कुर्बान हो गए| वो सरकारी स्कूलों के पढ़े लोग थे| परंपरागत विद्यालय जंगल में चले गए| सरकारी स्कूलों भी आपसी भावनाएं सलामत रहीं तो हम लोग आर. के मिशन, पण्डित दीन दयाल उपाध्याय सनातन धर्म विद्यालय, शिक्षा निकेतन में प्रवेश के लिए एडमिशन टेस्ट होते थे| उन टेस्टों में पास होने पर ही भर्ती हो पाती थी| हमारे सामने तीस जिन्दा सालों में कम से कम तीस प्रतिशत विद्यालय खण्डहर हो चुके हैं| सामने और लगभग सर पे सूरज हो तो सरजी पेड़ों के नीचे बिठा के पढ़ा दें और बालक पढ़ लें ये दौर तो अब शायद गावों से भी विदा हो गया| ऐसे में क्या विद्यालयों का खण्डहर होते जाने अवाम शिक्षित और सुसंस्कृत बन सकेगी? सब जाहिल और काहिल होने लगे तो क्या ऐसे में अवाम की बेचैनी और नशाखोरी नहीं बढ़ेगी? क्या यह माहौल सामाजिक विखंडन नहीं बढ़ाएगा? आपसी खींचतान और कट्टर होने के सिलसिले कहाँ ख़त्म होंगे क्या उसका अंदाजा है? भूकंप और युद्ध में डर लगभग एक जैसा होता है| कानपुर शहर मेरे होश में दो दंगों का गवाह है| विद्यार्थी जी भी एक दंगे में ही मरे थे| विद्यार्थी जी भगत सिंह की मौत के बाद भड़के दंगों में मौत की भेंट चढ़े थे| ये दंगे और आज की बदहाली किसी सामाजिक चिन्तक के लिए कतई अहम् नहीं? जो हैं भी वो गोविन्दाचार्य की तरह बाहर कर दिए गए| मजदूरों के शोषण के दम पर चीन में पनपी एफडीआई मजदूरों को चूसने की शर्तों पे ही भारत आई है| आंकड़ों को दरकिनार करिए और सोचिये कि दिहाड़ी मजदूरों के दिन कहाँ और कैसे गुजर रहे होंगे? मजदूर की बदहाली में उसकी संतान भी सरकारी स्कूलों के दम पर ही नेता और नौकरशाह बनते रहे तो देश ठीक चला| आज की एफडीआई स्कूल और कालेजों को क्या बनाने वाली है इसका तो पता नहीं लेकिन जल संसाधन पर्बंधन की बुनियादी समझ तो मर ही गई मानिये| दो करोड़ कुएं खोद कर गाँव और शहर बसाने वाले हिंदुस्तान में कुओं के लिए भी झगड़े होते देखे गए| आज पानी की लड़ाई में अवाम का एक बड़ा हिस्सा सुबह सुबह लाइन में लगने को मजबूर है| दूसरा सच ये भी है कि मजदूरों के आन्दोलन ख़त्म होने के बाद जो माहौल बना उसमे हमारे शहर की लेबर कॉलोनियां चरमरा गयीं| सभी कॉलोनियों में दो नयी कौमें पैदा हुईं| आज हमारा देश चीन की तरह उद्योगों की फेहरिस्त बढ़ाने में लगा है| मजदूरों के शोषण वाले शहर की बदहाली दीगर है| तकनीकी और एनआरआई दोनों की बदौलत इस शहर में जाहिल और गवांरों के जुल्म और बेइज्जती, अवामों के बीच आपसी रंजिश | बहुत पुरानी नहीं उन रंजिशों ने आज क्या रूप बनाया है ये आगे दंगों में देखना है या तरक्की में ये हमे और आपको तय करना है| यही बुनियादी लोकतंत्र बनाने वाले शहीदों ने किया और जिया| अमरेश मिश्र अट्ठारह सौ सत्तावन को सभ्यता का युद्ध कहते हैं, अंग्रेजी में वॉर ऑफ़ सिविलाइज़ेशन शीर्षक की उनकी किताब रूपा पब्लिकेशन ने छापी| उनकी किताबों में अजीजन रण्डी से लेकर बहादुरशाह जफ़र तक का साफ़ सुथरा इतिहास है जो शायद वीर सावरकर की किताब १८५७ से ज्यादा विषद और प्रमाणिक है| वॉर ऑफ़ सिविलाइज़ेशन में अगर अमरेश मिश्र की मानें तो ये कानपुर शहर अट्ठारह सौ सत्तावन में सबसे पहले आजाद होने वाला शहर था|
यहीं वह शहर था जहाँ अंग्रेज और गुलामी को हारना पड़ा| भले ही कानपुर की अवाम को ये याद न हो लेकिन 1857 के नतीजे में हिन्दुओं को गौमांस तक खिला के फांसी दी गई| किसको सजा मिली और कौन कौन सज गए ये बहुत पुरानी बात नहीं| और अगर इसे भी न देखना चाहें तो बताएं कि कितने स्कूल आगे बढ़े और सरताज हो गए| इतने बड़े विद्यार्थी वर्ग के होते हुए इस शहर के स्कूलों, कालेजों, विश्वविद्यालयों से अपने कूड़े की निजात न निकल सकी| आई.आई.टी जैसे संस्थानों को कभी शहर और अवाम की फिक्र रही क्या? आज अवाम को अपने नेता के रूप में प्रमिला पाण्डेय से क्या कोई उम्मीद नहीं? ऐसे में नगर विकास का खाका क्या अवाम से मिल के बन सकेगा? ऐसे में क्या अवाम को सस्ता इलाज मिल सकेगा? सस्ते इलाज के अस्पताल भी बीमार पड़े हैं| क्या उसके बाद भी? क्या अस्पतालों, स्कूलों, दफ्तरों में अवाम का शोषण रुक सका? क्या हमारी चच्ची प्रमिला जी इस भ्रष्टाचार को लगाम लगा सकेंगी? क्या पांच सौ से ज्यादा हमारे सरकारी विद्यालय आबाद हो सकेंगे? क्या हमारे शहर की अवाम को रोजगार मिल सकेगा? बड़ा सवाल क्या कूड़े से निजात मिल सकेगी? उससे भी बड़ा सवाल क्या गौमाता के लिए कुछ भावना संवेदना बन सकेगी? क्या गौमाता के लिए बनाये गए चारागाह कब्जे से मुक्त हो सकेंगे? क्या तालाबों की जमीनों का सत्यापन हो सकेगा? क्या आदमी को गहराते भूगर्भ जल का संकट भी कानून पालन करने के लिए प्रेरित कर सकेगा? नेशनल बिल्डिंग कोड में जल संसाधन प्रबंधन के लिए रेन वाटर हार्वेस्टिंग अनिवार्य है 2008 से, इसके बावजूद तीन सौ मीटर से ऊपर वाले सब के सब बड़े लोग बिना रेन वाटर हार्वेस्टिंग के घर बनवा लिए| अभी भी होश नहीं है किसी को? अब बताइए कि क्या इन कानूनों पर कोई आम समझ या बुनियादी सहमति होनी जरुरी नहीं? क्या अवाम को सरकारी योजनाओं में शामिल करना जरुरी नहीं? कितने नाविक और मल्लाहों के लड़के मौके पा सके? कितनी योजनाओं में उन्हें जोड़कर गुणा गणित किया गया? क्या प्रमिला जी इनसे रूबरू नहीं होंगी? क्या प्रमिला जी नगर स्वराज के बुनियादी अधिकारों के लिए शहर की अवाम की प्रतिनिधि की हैसियत से, नगरमाता की हैसियत से योगी जी से ये सब अधिकार मांग सकेंगी? मुझे उस वक़्त का इन्तेजार है जब राजनीति में आम लोगों की धार्मिक समुदायों की, विद्वानों, विद्यालयों, विश्वविद्यालयों की साझेदारी का इन्तेजार हैं| बहुत से सार्वजनिक मुद्दे ऐसे हैं जिनमे लापरवाही शहर को दिल्ली, चेन्नई या लातूर तक बनवा सकती है| क्या शहर की अवाम और हमारे नेताओं को थोडा गंभीरता से सोचने की जरुरत नहीं? जब दिल्ली आबाद हुई तो दिल्ली की आबादी दो ढाई लाख थी| ये आंकड़ा रिफ्यूजियों की आबादी मिला के बताई जाती है| इतनी आबादी से विकसित होते होते दिल्ली दो करोड़ पार कर गयी | नॉएडा, गुडगाँव, फरीदाबाद, और गाज़ियाबाद मिलाकर छः करोड़ पार कर चुकी दिल्ली के पास पीने को साफ़ पानी नहीं| यही हाल कानपुर का भी होता जा रहा है| दिल्ली में चाहे जो भी लीपापोती हो लेकिन शीला आंटी के जवानी के कारनामों के नतीजे बुढ़ापे में केजरीवाल हो गए| हमारे यहाँ की अवाम के लीडर आज़ादी की लड़ाई में विद्यार्थी थे, वे सारे विद्यार्थी भगत सिंह, चंद्रशेखर, गणेश शंकर, हसरत मोहानी, हेमू कालाणी बनकर निकले| क्या हमारे बीच हमारी अपनी चुनी हुई सरकार के रहते ऐसे नायकों के लिए जगह नहीं? क्या हम अपने बीच ऐसे लोगों को पहचानकर देश के एक अहम्की शहर की बागडोर सही युवा हाथों में सौंपने को तैयार हैं| लोहिया कहते हैं कि जिन्दा कौमें इन्तेजार नहीं करतीं, वो लोहिया आज मौजूद होते तो शायद यही सवाल करते कि
शहर के "पाठक" और "विद्यार्थी" लोकतंत्र में चूक गए क्या?

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